BRI को लेकर भारत को कमजोर करने के लिए चीन ने दक्षिण एशिया में तैनात किए खास राजदूत

संयुक्त मोर्चा निर्माण विभाग (UFWD) के करीबी चीन के एक राजनेता, नोंग रोंग को पाकिस्तान में राजदूत के रूप में भेजकर, बीजिंग बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के समर्थन में दक्षिण एशिया को प्रभावित करने की कोशिश में है। राजदूत नोंग ने इसी सप्ताह इस्लामाबाद में कैरियर राजनयिक याओ जिंग की जगह ली।

दक्षिण एशिया में तैनात चीनी राजदूतों पर गौर करें तो पता चलता है कि बांग्लादेश में बीजिंग की ओर से तैनात ली जिमिंग और श्रीलंका में पूर्व चीनी राजदूत Cheng Xueyuan के UFWD के साथ संबंध थे। यह वह संगठन है जिसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कई वर्षों तक कार्य किया है।

यहां तक ​​कि नेपाल में चीनी राजदूत होउ योंकी एक एशियाई मामलों की विशेषज्ञ हैं। वे पीएलए खुफिया पृष्ठभूमि के साथ 2012-2013 में विदेश सुरक्षा मामलों के विभाग के निदेशक थीं। वहीं उर्दू में महारथ हासिल एंबेसडर होउ को बीजिंग द्वारा नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन को एक साथ रखने और प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली और पार्टी अध्यक्ष पुष्पा कमल दहल या प्रचंड के बीच विभाजन करने का काम सौंपा गया है। स्पष्ट रूप से दक्षिण एशिया में चीन के राजदूतों का कार्य BRI को आगे बढ़ाना और भारतीय सभ्यता के प्रभाव को आक्रामक रूप से कम करना है।  

भारत-चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर महीनों से गतिरोध जारी है। चीनी सेना लगातार उकसावेपूर्ण हरकत कर रही है, जिसका भारतीय जवान मुंहतोड़ जवाब दे रहे। यह पूरी दुनिया को मालूम है कि जिनपिंग की सेना भारतीय जवानों को उकसाने का काम कर रही है, लेकिन चीन है जो ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली हरकत कर रहा है। चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने एक लेख में उल्टा भारत पर ही सीमा पर उकसाने का आरोप लगाया है। इसके साथ ही, चीन को भारत और अमेरिका की गाढ़ी दोस्ती भी रास नहीं आ रही है।

‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने लेख की शुरुआत अपनी आदत के अनुरूप झूठे दावे करते हुए की है। उसमें लिखा गया है, ‘जून में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने ज्यादातर चीन के खिलाफ ही कार्रवाई की है। आर्थिक और सैन्य रूप में भारत चीन से पीछे है, लेकिन इसके बावजूद भी क्यों चीन को उकसाने का रिस्क ले रहा है?’

चीनी प्रोपेगैंडा मुखपत्र ने आगे बताया है कि भारत का मानना है कि चीन युद्ध शुरू करने या युद्ध को आगे बढ़ाने के लिए पहल करने को तैयान नहीं है। इसी वजह से भारत सीमा पर छोटे पैमाने पर उकसावे का काम कर रहा है। वहीं, नई दिल्ली को लगता है कि चीन बड़े स्तर पर सैन्य संघर्ष में शामिल नहीं होगा, इसलिए वह अपने दृढ़ संकल्प के बारे में अपनी बात रखने की हिम्मत करता है।