राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को चुनौती

भारतीय संस्कृति में जय श्रीराम, जय हनुमान का उद्घोष और हनुमान चालीसा की पाठ के बिना किसी भी सांस्कृतिक, धार्मिकआयोजन के सम्पन्न होने की कल्पना नहीं की जा सकती है, फिर भी महाराष्ट्र में हनुमान चालीसा पढऩे को लेकर ऐसा विवाद हुआ कि महाराष्ट्र के अमरावती से निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति को राजद्रोह कानून के अंतर्गत गिरफ्तार होकर जेल जाना पड़ा। परिणामस्वरूप बुलडोजर के बाद देश में अब बजरगंबली की आराधना और राजद्रोह कानून का मुद्दा गरमा गया है। दूसरी ओर सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल एस जी बोम्बतकरे और एडिटर्स गिल्ड की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए गत 27 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एन वी रमना की अध्यक्षता वालीउनके साथ ही जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की बैंच नेराजद्रोह कानून124 ए की संवैधानिकता, आवश्यकता आदि से सम्बन्धित मामले की अंतिम सुनवाई की तिथि 5 एवं 6 मई नियत कर दी है, और यह घोषणा की है कि एक ही मसले पर बार-बार लोगों को सुनने से केस के निपटारे में बेवजह देरी ही होगी। दरअसल सर्वोच्च न्यायालय में राजद्रोह कानून के खिलाफ कुल सात याचिकाएं लंबित हैं। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने इस हफ्ते के अंत तक जवाब दाखिल करने का आदेश देते हुए सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा है कि सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे के आधार पर 5 मई से इस मामले पर अंतिम सुनवाई शुरू किया जाएगा। अब आगे सुनवाई को टाला नहीं जाएगा और अगर जरूरत हुई तो 5 और 6 मई को पूरे दिन इस मामले पर सुनवाई की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष जुलाई में भी राजद्रोह कानून पर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही एक सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश एन वी रमना ने केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के समक्ष टिप्पणी करते हुए कहा था कि स्वाधीनता के लिए संघर्ष का विरोध करने के लिए ब्रिटिश शासकों द्वारा लागू किए गए उपनिवेशवादी कानून राजद्रोह कानून का स्वतन्त्रता के 75 वर्षों के बाद देश में क्या आवश्यकता है? इस कानून का इस्तेमाल तो ब्रिटिश शासकों ने स्वतन्त्रता  के लिए संघर्ष करने वालों पर किया था।

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