ठाकुर अनुकूल चंद्र जी के अनुसार अगर हम दूसरे से सम्मान पाना चाहते हैं तो पहले हमें दूसरों को सम्मान करना होगा: नीरज निराला

डी एन कुशवाहा

ठाकुर अनुकूलचंद्र जी अपने हस्तलिखित पवित्र पुस्तक सत्यनुसरण की 14वां टॉपिक में कहते हैं कि तुम दूसरे से जैसा पाने की इच्छा रखते हो, दूसरे को वैसा ही देने की चेष्टा करो। अगर हम दूसरे से सम्मान पाना चाहते हैं तो पहले हमें दूसरों को सम्मान करना होगा। उक्त बातें ऑनलाइन सत्संग को संबोधित करते हुए ठाकुर जी के परम भक्त नीरज निराला दा ने गुरुवार को कही। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर हम दूसरों से प्रशंसा की आशा रखते हैं तो पहले दूसरों के छोटे-छोटे कामों पर प्रशंसा करनी होगी। अगर हम दूसरों से मदद चाहते हैं तो पहले हमें दूसरों की छोटी-छोटी मदद करनी होगी। अगर हम दूसरों से चाहते हैं कि वो हमें प्यार करें तो पहले हमें उनसे प्यार करना होगा और उनके लिए कुछ कर्म करना होगा। ठाकुर जी कहते हैं ऐसा समझ कर चलना ही काफी है, स्वयं ही, सभी तुम्हें पसंद करेंगे, प्यार करेंगे। अच्छे संस्कार और अच्छा व्यवहार मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। अच्छे संस्कार के लिए अच्छी आदत डालनी ही पड़ेगी। और इसके लिए स्वयं वैसा कर्म करना होगा, जैसा आप बनना चाहते हैं। अच्छा व्यवहार भी स्वयं दूसरों के साथ करना होगा। आत्म नियंत्रण और आत्म संयम से सब कुछ संभव है। आत्म नियंत्रण मनुष्य को खर्च को नियंत्रण करने में मदद करता है जिससे कम खर्च में संसार में रहना सीख लेता है। आत्म संयम मनुष्य को चरित्रवान होने में मदद करता है जिससे एकाग्रता में मनुष्य आ जाता है। और जिस मनुष्य में एकाग्रता आ जाता है, वह मनुष्य जिस किसी भी काम को अपने हाथ में लेता है, सुंदर ढंग से समापन करता है। जो मनुष्य सुंदर ढंग से किसी काम को समापन करता है, उस मनुष्य को सुख शांति भी कभी छोड़कर नहीं जाता। दीर्घ जीवन और स्वस्थ जीवन का हकदार बन जाता है। गुणवान पुत्र पुत्री का भी माता और पिता बन पाता है। जो आगे चलकर कुल और वंश का उद्धार कर्ता बनता है। ठाकुर जी कहते हैं स्वयं ठीक रह कर सभी को सत् भाव से खुश करने की चेष्टा करो। देखोगे, सभी तुम्हें खुश करने की चेष्टा कर रहे हैं। सावधान, निजत्व खोकर किसी को खुश करने नहीं जाओ। अन्यथा तुम्हारी दुर्गति की सीमा न रहेगी। चरित्र और सदाचार को किसी भी कीमत पर नहीं खोनी चाहिए। क्योंकि यह मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है।

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