” श्रीश्रीठाकुर जी के दृष्टि में देवी माँ सरस्वती ” का अर्थ गतिमति या वे हैं गति के प्रतीक: त्रिलोचन प्रसाद
क्राइम फ्लैश न्यूज

डी एन कुशवाहा

रामगढ़वा पूर्वी चंपारण- माघ के महीने ,शुक्ल पंचमी तिथि में माँ सरस्वती पूजा की जाती है । सकल विद्या के अधिकारीणी माँ के नाम अनेक और उनकी सुरूप भी वैचित्र्यमय है। बागदेवी , बाक्येश्वरी ,भारती , वाणी , बीणापाणी ,आदि नाम से वे भूषिता है । उनकी वाहन है हंस , पद्म ( कमल ) के ऊपर उनकी आसन ,हस्त में पुस्तकें और वीणा । अब इन विषय पर आलोकपात करते है । उक्त बातें ठाकुर जी के परम भक्त व रांची निवासी त्रिलोचन प्रसाद ने सरस्वती पूजा के शुभ अवसर पर ऑनलाइन सत्संग को संबोधित करते हुए शनिवार को कही। उन्होंने कहा कि सरस्वती शब्द का अर्थ है सरसवती अर्थात जलवती । सरस् शब्द संस्कृत ” सृ ” धातु से उत्पन्न ,जिसका अर्थ है गति , चलना । उन्होंने कहा कि श्रीश्री ठाकुर जी की भाषा में सरस्वती का अर्थ गतिमति या वे हैं गति के प्रतीक ।
सृ धातु का और एक अर्थ है विकशित होना । इसीलिए “सरस्वती ” शब्द में है विकाश का प्रवणता । उन्होंने कहा कि श्रीश्रीठाकुर जी ” सरस्वती ” शब्द की संज्ञा निर्णय किये है ,
विशाल – व्याकुल गति ही है जिनकी संस्तिति ,वे ही सरस्वती , और बाग या शब्द ही है जिनकी सत्ता
वे ही वागदेवी । “
इस प्रसंग में महाकवि कालिदास रघुवंशम् में उल्लेख किये हैं , ” उच्चरूरपुरस्तस्य गुढ़रुपा सरस्वती “अर्थात शब्द का प्रतीक सरस्वती गूढ़ रूप में सृष्टि का आदिम काल से सकल शक्ति का उत्स रूप में परीब्याप्त है ।
वीणा :- देवी सरस्वती सर्वदा वीणाबादनारता । वीणा शब्द संस्कृत ‘ वी ” धातु से उत्पन्न हुआ है। जिसका अर्थ है गति और ब्याप्ति । वे सर्बदा शब्दरूपिणी रूप में सर्वत्र परिब्याप्त होकर सभी जीवों को गतिशील कराती हैं ।
जल :- माँ सरस्वती जल के ऊपर स्थित पद्म ( कमल ) के ऊपर समासिना हैं । जल ही है जीवन का प्रतीक ।
पद्म (कमल ) :- पद्म शब्द संस्कृत ‘ पद’ धातु से उत्पन्न हुआ है। जिसका अर्थ है स्थिति , गति , प्राप्ति । जीवन की स्थिति को गतिशील करके रखना होगा । जैसे गति , ऐसी प्राप्ति ।
हंस :- हंस जैसे दुध और जल का मिलावट से जल को अलग करके दूध को आहरण करती है , ऐसा ही जागृत हुआ विवेक शक्ति के माध्यम से सुपथ को निर्णय करके गंतब्य का पथ स्थिर करना चाहिए। देवी माँ शुक्ल वस्त्र परिहिता। शुक्ल अर्थात शुचि या पवित्रता । दैहिक , मानसिक और आध्यात्मिक सदाचार से ही पवित्र भाव का उद्रेक होता है ।
सदाचार पालन करने के लिए श्रीश्रीठाकुर जी का अनोखा विधान स्वस्त्ययनी व्रत पालन करना पड़ता है। इस व्रत के आचरण से सभी प्रवृत्ति को इष्टार्थ में विनियोग करके स्वस्ति पथ में चलने से विवेक शक्ति का उन्मेष होता है।
श्री प्रसाद ने कहा कि सरस्वती पूजा के दिन श्रीश्रीठाकुर जी के साथ एक घटना यहाँ पर उपस्थापना करना चाहूंगा। स्नान आदि करके श्रीश्रीठाकुर जी अश्विनी – दा के साथ अंजलि देने गए। अविनाश – दा हँसते हुए मंत्रोच्चारण कर रहे हैं तथा श्रीश्रीठाकुर जी उस मन्त्र को दुवारा उच्चारण करके पुष्पांजलि दे रहे हैं । अश्विनी – दा भी पुष्पांजलि देने के लिए घुटनों के बल बैठे हुए हैं । पर वे मन ही मन महामंत्र, उनका आदि ध्वन्यात्मक नाम ( सतनाम मन्त्र ) को जप कर रहे हैं । वे सोच रहे हैं कि अंजलि दूँ कहाँ ? साक्षात् प्रत्यक्ष परमपुरुष पुरूषोत्तम , जो है भव भयहारी, जो परावाक् सरस्वती के भी जनक है, जिनमें से स्वयं ब्रह्म रूपणी सरस्वती की उत्पत्ति हुईं हैं, उस आदिपुराण परमपुरूष, परमपिता के जो नरविग्रह आविर्भूत हैं, उस विग्रहचरण में या घटाधिस्थित देवी माँ के चरणों में ? परन्तु अश्वनी दा देख रहे हैं कि स्वयं श्रीश्रीठाकुर जी ही तो लोकधर्म व समाजधर्म का पालन करने के लिए कलश पर अंजलि दे रहे हैं और उनकी आज्ञा ही शिरोधार्य है। इसलिए उन रातुल चरणों में अंजलि देने का लोभ संवरण करके उन्होंने कलश पर ही अंजलि दी ।
इन सभी बातों को एकांत में बैठकर अश्वनी दा नोट कर रहे थे। तभी अचानक श्रीश्रीठाकुर जी वहाँ आए और हँसते – हँसते अश्वनी दा को गले से लगाते हुए बोले —
” दे तुले दे पाल , देखबि दयाल आजि दया कोरे धोरबे, ऐसे हाल।”
अर्थात — दो, उठा दो पाल। देखोगे, दयाल आज आकर कृपा करके तुम्हारा पतवार संभाल लेंगे।[ अमिय-वार्ता, पृष्ठा संख्या 89 – 90 ]
वन्दे पुरूषोत्तमम्!

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