वेद में कुल एक लाख मंत्र हैं,चार हजार ज्ञानकांड व सोलह हजार कर्मकांड

कर्मकांड से केवल लौकिक , धनधान्य ,संतति आदि वस्तुओं की ही नही अपितु पारलौकिक ‘मोक्ष’ आदि पदार्थों की भी प्राप्ति होती है: आचार्य सर्वेश पांडेय
क्राइम फ्लैश न्यूज

डी एन कुशवाहा

रामगढ़वा पूर्वी चंपारण – हिन्दुओं द्वारा विभिन्न अवसरों पर की जाने वाली पारंपरिक पूजा -ऋचा का क्रियात्मक रूप कर्मकांड कहलाता है। उक्त बातें प्रेस वार्ता के दौरान आचार्य सर्वेश पांडेय ने मंगलवार को कही। साथ ही उन्होंने कहा कि वेद में कर्मकांड, उपसनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड- इन तीनों का वर्णन मिलता है । उन्होंने कहा कि वेद के कुल एक लाख मंत्र हैं – चार हजार ज्ञानकांड के और सोलह हजार कर्मकांड के। इसलिए कर्मकांड को प्रधान स्थान प्राप्त है। इस प्रकार वेद के तीन भाग हैं ।”तीन कांड एकत्व ज्ञान -वेद ।
वेद के कर्मकांड भाग में यज्ञादि विविध अनुष्ठानों का विशेष रूप से वर्णन मिलता है। अत: यज्ञ कर्मकांड ही वेदों का मुख्य विषय है । वेदों का मुख्य विषय होने के कारण कर्मकांड में मंत्रों का प्रयोग (उच्चारण ) किया जाता है।वेद मंत्रों के बिना कर्मकांड नही हो सकता और कर्मकांड के बिना मंत्रो का ठीक-ठीक सदुपयोग नही हो सकता ।अत: स्पस्ट है कि वेद है तो कर्मकांड है और कर्मकांड है तो वेद है । विष्णु धर्मोत्तर पुराण (2/04) में वर्णन आता है वेदास्तु यज्ञार्थ मभिप्रावीरतः। इस वचन से तथा भगवान मनु के दुदोह यज्ञ सिध्यमि 1/23 इस वाक्य से स्पष्ट सिद्ध है कि वेदों का प्रादुर्भाव कर्मकांड , यज्ञ ,अनुष्ठान के लिए हुआ है । जिस प्रकार वेद
: जिस प्रकार वेद दुरूह है उसी प्रकार वेदांग भूत कर्मकांड भी अत्यंत दुरूह है।जिस प्रकार वेद में उपास्य देवता है उसी प्रकार कर्मकांड में भी उपास्य देवता है ।जिस प्रकार वेद उपास्य वेद किसी पुरुष के द्वारा न बनाया हुआ । नित्य और अनादि है – पराशर स्मृति में वर्णन आता है। श्री पांडे ने कहा कि वेद को बनाने वाला कोई नही है । चतुर्मुख ब्रह्मा ने वेद का स्मरण किया । ठीक उसी प्रकार यज्ञ अनुष्ठान, कर्मकांड भी अपौरुषेय ,नित्य और अनादि है। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र “अग्निमिडे पुरोहितम ” में यज्ञ (कर्मकांड ) पद आया है अतः सिद्ध होता है कि वेद से भी प्राचीन कर्मकांड हैं। कर्मकांड वैदिक संस्कृति का प्रधान अंग है । कर्मकांड से ही समस्त मनुष्यों की कामनायें सिद्ध होती हैं । कर्मकांड ,मनुष्य की इक्षित कामना एवं कल्याण व लौकिक सुख-शांति तथा मन में संकल्पिक अनेकानेक इक्षाओं को पूर्ण करता है। हमारे धर्माचार्यो ने मनुष्य के लिए जितने भी धर्म कहे हैं वे सभी कर्मकांड लक्षण से संयुक्त हैं । प्राचीन ऋषि महर्षियो ने शास्त्रो के अनुसार ही अपना जीवन यज्ञमय बनाया था । वे यज्ञ कर्मकांड द्वारा अपना और जगत का कल्याण किया करते थे। वस्तुतः कर्मकांड में अपूर्व शक्ति है । ‘कर्मकांड से जो जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए इच्छा करता है वह उसको वही वस्तु देता है । “यो यदिक्षति तस्य तत “। (कठोपनिषद ) 12/16 अतः स्पस्ट है कि संसार मे ऐसी कोई वस्तु नही है जो कर्मकांड के द्वारा प्राप्त न हो सके । कर्मकांड से केवल लौकिक , धनधान्य ,संतति आदि वस्तुओं की ही नही अपितु पारलौकिक ‘मोक्ष’ आदि पदार्थों की भी प्राप्ति होती है । इस श्रेष्ठ कर्म के विधि-विधान भी अत्यंत कठिन है। कर्मकांड के तीन बिशेष अंग हैं ।1. कंडी 2.पिंडी व 3. चंडी कंडी (कुष्कंडिका): हवन से पूर्व जो कर्म है वह कंडी है । पिंडी : श्रद्धादि में जो पिंडादि क्रिया होती है उसको पिंडी कहते है ।

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