धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक आधार भी हैं श्राद्ध पक्ष के

हिन्दू संस्कृति के अनुसार श्राद्ध पक्ष का ना सिर्फ धार्मिक व आध्यामिक महत्व है, बल्कि इसे मनाए जाने के प्रमाणिक वैज्ञानिक तथ्य भी मौजूद हैं। सनातन धर्म परम्परा के अनुसार मृतक परिजनों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है, जो प्रति वर्ष भाद्र शुक्ला पूर्णिमा से अश्विनी माह की अमावस्या तक सोलह दिन चलता है। गरूड़ पुराण में लिखा गया है कि समयानुसार श्राद्ध करने से आयुष्य, संतान, यश कीर्ति और सुख प्राप्त होता है। श्राद्ध के बारे में सनातन धर्म परम्परा के साथ साथ वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। हमारे पूर्वजों तथा ऋषि मुनियों ने श्राद्ध पक्ष की धर्म आस्था के अलावा प्रकृति की रक्षा के लिए भी अति उपयोगी व्यवस्था स्थापित की है। हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों में जन्म मुत्यु का रहस्य अत्यन्त गुढ़ बताया गया है और सभी ग्रंथों में जन्म मृत्यु के रहस्य की विस्तृत व्याख्या भी की हुई है। प्रकृति का नियम है कि आत्मा कभी मरती नहीं बल्कि बार बार जन्म लेती है। इस पुनर्जन्म के आधार पर ही कर्म कांड और श्राद्ध का विधान बनाया हुआ है, जो व्यवस्था देव तुल्य ऋषि मुनियों द्वारा उल्लेखित है।

श्राद्ध में कौवों को भी आहार दिया जाता है, जिसका कतिपय लोग मजाक भी उड़ाते हैं कि पितृ कौवे बन कर आते हैं क्या ? ऐसी हास्यास्पद बात कहने वालों को मूढ़मति कहा जाना गल्त नहीं होगा। कौओं को आहार देने के पिछे भी एक हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्रकृति की रक्षा के लिए स्थापित की गई अति उपयोगी व्यवस्था है और इसके वैज्ञानिक आधार भी है। कौवों के जरिए मानव जीवन के लिए बहुपयोगी पीपल तथा बड़ के पौधे तैयार होते हैं। पीपल तथा बट वृक्ष के ना तो बीज लगाए जाते हैं तथा ना हि इनको रोपण के द्वारा लगाया जाना संभव होता है। यह दोनों पौधे कौवों की बीट से पनपते है। मादा कौवे बारिश के दौरान यानि भादवा माह में ही अंडे देती है। उनके नवजात बच्चों को समूचित आहार मिल सके, उसके लिए श्राद्ध पक्ष कौवों के हिस्से का आहार निकाला जाता है। श्राद्ध के आहार से उन बच्चों का आवश्यक पोषण होता हे। इसके अलावा कौवे पीपल तथा बड़ की बटी भी खाते रहते हैं, जो उनकी बीट के साथ नव पौधों के लिए आवश्यक उपयोगी साबित होती है। विज्ञान में भी श्राद्ध में कौवों के आहार को प्रकृति रक्षण का एक हिस्सा माना गया है। स प्रकार श्राद्ध पक्ष में कौवों को आहार देना तर्क संगत है।

इसी तरह एक धार्मिक मान्यता यह भी है कि वर्षाकाल के बाद आकाश पूरी तरह से साफ हो जाता है। उस कारण यह माना जाता है कि हमारी प्रार्थनाएं, धार्मिक भावनाएं, संवेदनाएं सर्वत्र प्रेषित करने के लिए स्वच्छ आकाश मार्ग सुलभ हो जाता है। फिर पितरों के निमित इस काल में सूर्य भी कन्या राशि में रहता है और ज्यातिषियों के अनुसार यह पितरों के लिए अनुकूल गणना होती है।  एक तथ्यात्मक प्रसंग यह भी आता है कि खीर भी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। जिस प्रकार शरद पूर्णिमा की रात को चांदी या कांसे के बर्तन में खीर रख कर सुबह खाई जाती है, वैसे ही श्राद्ध के दिनों में खीर खाने से शरीर की क्षमता में वृद्धि होती है। इस बात को स्वास्थ्य विज्ञान भी मानता है कि शरद पूर्णिमा की रात की खीर अस्थ्मा रोगियों के लिए लाभकारी होती है तथा श्राद्ध में खाई गई खीर से वर्षा के मौसम में बढ़े पित प्रकोप को कम करने में अनुकूल होती है।  इन धार्मिक तथा वैज्ञानिक तथ्यों के आधार यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि श्राद्ध महज कोई परम्परा या अंध प्रथा नहीं हैं बल्कि हर दृष्टि से अनुकूल एक  तथा प्रासंगिक पर्व का ही प्रतिरूप है। श्राद्ध पक्ष का मजाक उड़ाने वालों को यह समझना चाहिए कि सनातन हिन्दू धर्म में वैज्ञानिक तथा प्राकृतिक आधार मौजूद हैं।