Published On: Mon, Dec 11th, 2017

गिरती हुई राजनीति और नेताओं का स्तर

दुनिया में अभी तक शासन चलाने के लिए जितनी भी प्रणालियां हैं उनमें लोकतंत्र को सबसे बेहतर माना जाता है फिर चाहे वह अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली वाला लोकतंत्र हो या फिर भारत और ब्रिटेन जैसा संसदीय प्रणाली वाला। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें जन अकांक्षाओं का बेहतर प्रतिनिधित्व होता है। एक आम आदमी भी किसी दिन खास बनकर सबसे ऊंचे पद को सुशोभित कर सकता है। लोकतांत्रिक प्रणाली के हर देश में अलग-अलग स्वरूप हैं लेकिन इनमें एक बात सबसे कॉमन है। वह यह है कि इसमें अपनी जगह बनाने और आगे बढ़ने के लिए वोटों का जुगाड़ करना जरूरी है। जहां तक भारत का सवाल है तो वोटों की इसी जरूरत के चलते यहां राजनीति और नेताओं का स्तर गिरता जा रहा है। पिछले दो दशकों के दौरान मीडिया, सोशल मीडिया, ट्विटर जैसे प्रचार माध्यमों ने इस समस्या को और भी बढ़ाया है। आज हर पार्टी में छोटे से लेकर बड़े तक ऐसे अनेक नेता मौजूद हैं जो किसी मुद्दे का रचनात्मक विरोध करने की बजाय टीवी पर बाइट या ट्विटर पर विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरने की चाहत रखते हैं। दुर्भाग्यवश यह बीमारी कभी निचले दर्जे के नेताओं से शुरू हुई थी जो अब बड़े नेताओं तक फैल गई है। Read This – भारतीय मुस्लिम समाज की स्थिति तथा इससे उबरने का रास्ता दरअसल ऐसे बयान या टिप्पणियां एक वर्ग या समुदाय को रिझाने या उसे संतुष्ट करने के लिए होती है। चुनाव के दौरान इनका इस्तेमाल अकसर गोलबंदी के लिए किया जाता है। यह बात अलग है कि कभी-कभी सेल्फ गोल से नुकसान होने की आशंका भी हो जाती है। ताजा मामला वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के लिए नीच शब्द के इस्तेमाल को लेकर है लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेताओं ने इसे गुजरात की अस्मिता से जोड़ा वैसे ही कांग्रेस नेताओं को इस बयान का नुकसान समझ में आ गया। डैमेज कंट्रोल के लिए आनन-फानन में उन्हें पार्टी से सस्पैंड कर दिया गया।

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