Published On: Tue, Aug 7th, 2018

भेदभावपूर्ण प्रावधान

रोहिंग्या मुसलमानों को गले लगाने वाले और घुसपैठियों के लिए छाती पीटने वाले जम्मू-कश्मीर में दशकों से रह रहे उन निवासियों के प्रति न्याय का विरोध कर रहे हैं जिन्हें एक षड्यंत्र के तहत उनके मूल अधिकारों से वंचित कर दिया गया। बात अनुच्छेद 35-ए की है जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है और जम्मू-कश्मीर की दोनों बड़ी पार्टियां पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के नेता महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला धमकी दे रहे हैं कि यदि अनुच्छेद 35-ए समाप्त हुआ तो जम्मू-कश्मीर के विलय का आधार ही समाप्त हो जाएगा। मतलब कि जम्मू-कश्मीर भारत का अंग ही नहीं रह सकेगा। उमर अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया कि यदि अनुच्छेद 35-ए हटाया तो अमरनाथ यात्रा भूल जाएं हिन्दू और महबूबा मुफ्ती कह रही हैं कि यदि अनुच्छेद 35-ए हटा तो राज्य में तबाही आ जाएगी। इसके अलावा ये दोनों ही क्यों अपने को धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पार्टियां भी इस भेदभावपूर्ण अनुच्छेद का समर्थन कर रही हैं।  संविधान का अनुच्छेद 35-ए एक ऐसा संवैधानिक धोखा है जिसने जम्मू-कश्मीर के लाखों लोगों की जिन्दगी को नारकीय बना दिया है। संविधान में न मिलने वाला अनुच्छेद 35-ए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को यह अधिकार देता है कि वह स्थायी नागरिक की परिभाषा तय कर सके। 1947 में हुए बंटवारे के बाद लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए और देश के हर क्षेत्र में अपनी सुविधानुसार बसे। लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थिति ऐसी नहीं है। यहां आज भी कई दशक पहले से बसे लोगों की चौथी-पांचवीं पीढ़ी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है। एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे। इन हिन्दू परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत अनुसूचित जाति के थे। आज भी न तो उन्हें सरकारी नौकरी पाने का अधिकार है, न राज्य द्वारा कराए गए किसी चुनाव में वोट देने का अधिकार है और न ही सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में दाखिला पाने का अधिकार है। यही हालत गोरखा समुदाय की भी है। वे भी हर तरह के अधिकार से वंचित हैं। वाल्मीकि समुदाय की हालत तो और भी बुरी है। इस समुदाय के करीब 200 परिवारों को 1957 में पंजाब से जम्मू-कश्मीर बुलाया गया था। कैबिनेट के एक फैसले के मुताबिक इन्हें सफाई कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया। बीते 61 वर्षों से ये लोग सफाई का काम कर रहे हैं किन्तु इन्हें आज भी जम्मू-कश्मीर का स्थायी सदस्य नहीं माना जाता। इनके बच्चों को सरकारी स्कूलों, व्यावसायिक संस्थानों में पढ़ने की अनुमति नहीं है। यदि बच्चा कहीं निजी संस्थान से व्यावसायिक शिक्षा ले भी ले तो इन्हें राज्य की सरकारी नौकरियां नहीं मिलतीं। इन्हें सिर्प सफाई कर्मचारी की ही नौकरी मिल सकती है।

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