Published On: Sun, Jan 13th, 2019

यूपी में अखिलेश-मायावती का चक्रव्यूह, दिल्ली में पीएम मोदी की रणनीति

एक ही वक्त पर राजनीति के तीन धुरंधर. तीनों का मिशन एक-लोकसभा चुनाव 2019. जिस वक्त उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सियायत के दो धुर विरोधी एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव और बीएसपी अध्यक्ष मायावती एक होकर प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनावी चक्रव्यूह बना रहे थे. उसी वक्त दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी इस चक्रव्यूह के खिलाफ अपनी रणनीति पर काम रहे थे.  लोकसभा चुनाव 2019 की जंग कितनी ज़ोरदार है इसका अहसास हर दिन होता जा रहा है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पहले ही इस बार के लोकसभा चुनावों को पानीपत की लड़ाई कह चुके हैं.  पानीपत की जंग सरीखे इस चुनाव का असली अखाड़ा तो यूपी ही बनने वाला है , जिसके दो बड़े सूरमा अखिलेश और मायावती ने एक साथ आकर अपना पहला दांव चल भी दिया है.

पीएम मोदी के खिलाफ अखिलेश-मायावती का अंकगणित

दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही निकलता है. सूबे की सर्वाधिक 80 विधानसभा सीटें सत्ता का पासा पलटने का दम रखती हैं. इस दम को आज़मा रहे हैं अखिलेश यादव और मायावती. ये दोनों पार्टियां कभी एक-दूसरे की धुर विरोधी हुआ करती थीं. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी की लहर ऐसी चली कि बीएसपी के सारे सांसद लोकसभा से साफ हो गए. और समाजवादी पार्टी के भी मुलायम कुनबे को छोड़ सभी दिग्गज धराशायी हो गए. दोनों पार्टियों के नेताओं के लिए सियासी हालात ऐसे बन गए कि बग़ैर एक हुए वजूद बचाना मुश्किल नज़र आने लगा. एकजुटता की सूरत में वोटों का अंकगणित भी मुनाफे में पहुंचाने का सबूत दे रहा था. लिहाज़ा एसपी और बीएससी ने बरसों पुरानी दुश्मनी भुलाकर दोस्ती का हाथ मिलाया.

इसके नतीजे भी उम्मीद के मुताबिक मिले. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ सूबे की सत्ता में मिले प्रचंड बहुमत के बावजूद अपनी गोरखपुर सीट को नहीं बचा पाए. तो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की फूलपुर सीट का भी यही हाल रहा. कुछ दिन बाद कैराना में भी एसपी-बीएसपी गठबंधन ने इतिहास दोहराया. इस जीत ने मायावती और अखिलेश के भीतर नई ऊर्जा भर दी. जिसका औपचारिक एलान आखिरकार दोनों नेताओं ने एक साथ सामने आकर शनिवार को लखनऊ में किया. यहां से एसपी-बीएसपी के उस सियासी चक्रव्यूह ने अमली जामा पहना जो ये दोनों दल पीएम मोदी के ख़िलाफ़ तैयार कर रहे हैं. यूपी में पिछले लोकसभा चुनाव में बीएसपी एक भी सीट बेशक़ ना जीत पाई हो, लेकिन उसे करीब 22 फीसदी वोट मिले थे.

खास बात ये है कि 2009 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 2014 के चुनावों में बीएसपी को डेढ़ फीसदी वोट ज्यादा मिले. 2014 के लोकसभा चुनाव में एसपी को भी करीब साढ़े 22 फीसदी वोट मिले. . इन दोनों वोटबैंक का जोड़ होता है साढ़े 44 फीसदी. जबकि 80 में से 71 सीट जीतने वाली बीजेपी को लोकसभा चुनाव में यूपी में 42 फीसदी से कुछ ज्यादा वोट मिले. यानी एसपी और बीएसपी के वोट करीब 2 फीसदी ज्यादा हैं. ये 2 फीसदी वोट यूपी की 80 सीटों पर बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.

गठबंधन का कांग्रेस से किनारा, लेकिन डोर भी जुड़ी

अखिलेश यादव और मायावती ने अपने गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया है, लेकिन कांग्रेस से पूरी तरह नाता भी नहीं तोड़ा है. डोर का एक छोर अभी भी उन्होंने थामे रखा है ये कहते हुए कि सोनिया गांधी की परंपरागत सीट रायबरेली और राहुल गांधी की परंपरागत सीट अमेठी में दोनों पार्टी अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे. ये उस सियासत का तक़ाज़ा है, जो चुनाव बाद बनने वाले हालात को थामे रखना चाहती है. कांग्रेस के बिग ब्रदर वाले रोल को यूपी में मायावती और अखिलेश दोनों ही कबूल नहीं करना चाहते, क्योंकि अंकगणित में कांग्रेस इन दोनों से बहुत पीछे है.

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज़ साढ़े 7 फीसदी वोट मिले थे. ऐेस में कांग्रेस को शामिल करने पर 80 सीटों का जो बंटवारा एसपी और बीएसपी में अभी हुआ है उसमें पेच पड़ सकता था. अभी एसपी और बीएसपी 38-38 सीटों पर लडेंगे. रायबरेली-अमेठी की 2 सीटें राहुल-सोनिया के लिए छोड़ दी गई हैं. 2 सीटें कुछ और सहयोगियों के लिए. मोटेतौर पर आरएलडी के लिए. इसके बाद भी कुछ दल आते हैं तो मायावती और अखिलेश अपने-अपने कोटे से एडजस्ट करेंगे. कांग्रेस गठबंधन में आती तो कम से कम 25 सीटें मांगती. जबकि एसपी-बीएसपी उसे सिर्फ 5 से 10 सीटें देने के ही मूड में थे.

कांग्रेस को लेकर एक पेच और भी है, जिसका जिक्र प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने किया. मायावती का कहना है कि गठबंधन की सूरत में कांग्रेस के वोट दूसरे दल के उम्मीदवार को ट्रांसफर नहीं होते, जबकि उनकी पार्टी के वोट कांग्रेसी उम्मीदवार को मिल जाते हैं. ख़ैर, गठबंधन में शामिल ना करके भी रायबरेली-अमेठी के जरिये कांग्रेस के साथ रिश्तों की डोर गठबंधन ने जोड़े रखी है. इस डोर को कौन खींचेगा. किस ओर खींचेगा ये नतीजों के बाद ही  पता चलेगा.

गठबंधन के चक्रव्यूह के खिलाफ पीएम मोदी की रणनीति

एसपी-बीएसपी के गठबंधन के खिलाफ पीएम मोदी की रणनीति बिल्कुल अलग है. असल में अखिलेश और मायावती का गठजोड़ जिस बुनियाद पर टिका है पीएम मोदी उस बुनियाद को ही जड़ से खत्म करने की रणनीति बना चुके हैं. जातीय आंकड़ों के आधार पर जिस वोट प्रतिशत पर गठबंधन गुमान करना चाहता है, पीएम मोदी उस जातीय अंकगणित को ही पलटना चाहते हैं. इसके लिए सवर्ण आरक्षण का बड़ा दाव वो पहले ही चल चुके हैं. अब कोटे की काट में पीएम मोदी का कोटा सामने है.

मध्यम वर्ग का एक बड़ा तबका मोदी के इस दाव में विपक्ष के वार को कमज़ोर कर सकता है. इसमें मुस्लिम और ईसाई जैसा वो वर्ग भी मोदी के साथ आ सकता है, जो अभी तक सांप्रदायिकता के नाम पर बीजेपी को अछूत मानता था. इसके साथ ही किसान भी खासतौर पर पीएम मोदी के टारगेट पर हैं. इसका सबूत है यूपी में दो दिन पहले ही की गई यूरिया के दामों में गिरावट. यानी मोदी किसानों के जरिये जातीय खांचे को खत्म करने की फिराक़ में हैं तो आरक्षण के दाव से एक बार फिर सवर्णों को पूरी तरह गोलबंद करने में जुटे हैं.

एसपी-बीएसपी से ज्यादा फोकस कांग्रेस पर 

अपने ख़िलाफ़ बने इस सबसे बड़े चक्रव्यूह की काट पीएम मोदी के पास ना हो ऐसा हो नहीं सकता. पीएम मोदी की रणनीति चुनावी रण के बढ़ने के साथ ही सामने आती जाएगी. वैसे भी यूपी में एसपी-बीएसपी के गठबंधन से भी ज्यादा फिक्र फिलहाल उन्हें कांग्रेस और राहुल गांधी की है, जिनका कद धीरे-धीरे ही सही बढ़ता नज़र आ रहा है. इसीलिए जिस वक्त लखनऊ में अखिलेश और मायावती उनके लिए चक्रव्यूह तैयार कर रहे थे. उस वक्त भी दिल्ली में पीएम मोदी के निशाने पर कांग्रेस ही थी. पीएम मोदी की रणनीति उत्तर भारत में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई दक्षिण भारत से करने की है.

इसीलिए वो पिछले कई दिनों से एप के जरिये दक्षिण भारत के प्रदेशों में बीजेपी कार्यकर्ताओं से लगातार वीडियो कांफ्रेंसिंग कर रहे हैं. कांग्रेस के कब्ज़े में जा चुके मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की लोकसभा सीटों को अपने पाले में बनाए रखना भी पीएम मोदी के टारगेट पर है. इसलिए उनका पूरा फोकस कांग्रेस पर है. पीएम मोदी की रणनीति का बड़ा हिस्सा उनके ओजपूर्ण भाषण हैं, जिनके निशाने पर कांग्रेस और गाँधी परिवार है. पीएम मोदी की रणनीति का दूसरा हिस्सा ज्यादा से ज्यादा इलाकों का खुद दौरा करना है. ताकि उनकी सरकार को लेकर जो नकारात्मकता जनता के बीच आ रही है उसे खत्म किया जा सके.


अब दिल्ली की सत्ता का सारा खेल यूपी के गठबंधन और उन तीन राज्यों पर टिक गया है, जहां चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस सत्ता में आ गई है. अगर यूपी में गठबंधन का अंकगणित सटीक हो गया. और अपने राज्यों में कांग्रेस खुद को साबित कर लेती है तो 2019 की तस्वीर उम्मीद से अलग नज़र आ सकती है. राहुल गांधी भी बाज़ी मार सकते हैं. मायावती और मुलायम सिंह यादव का सपना भी साकार हो सकता है.

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