Published On: Sun, Nov 4th, 2018

चीन अपनी मुद्रा युआन को कैसे काबू में रखता है?

 

अमरीका के साथ जारी ट्रेड वॉर और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार सुस्त पड़ने से चीन का युआन अपने 10 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया है. बीते गुरुवार को यह गिरकर 6.97 युआन प्रति डॉलर पर आ गया. मई 2008 के बाद यह युआन का न्यूनतम स्तर है.

दिसंबर 2016 में भी युआन 6.95 के स्तर तक पहुंच गया था. लेकिन साल 2017 के पूर्वार्ध में यह वापस 6.5 के स्तर पर लौट आया था, जिसके आसपास यह पिछले नौ साल से बरकरार था.

साल 2018 के फ़रवरी-अप्रैल के बीच तो यह 6.26 के स्तर तक पहुंच गया था लेकिन फिर चीन और अमरीका के बीच शुरू हुए टैरिफ़ वॉर का असर दिखने लगा.

अमरीकी ट्रंप प्रशासन का कहना है कि चीन निर्यात को बढ़ावा देने के लिए जान-बूझकर अपनी मुद्रा को कम स्तर पर रखता है.

वहीं चीन का कहना है कि वो युआन को स्थिर रखने की कोशिशें कर रहा है.

तो चलिए यह जानने की कोशिश करते हैं कि चीन का युआन कैसे काम करता है और अमरीका के साथ चल रहे ट्रेड वार के बीच युआन के अपने न्यूनतम स्तर पर आने के क्या मायने हैं?

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कैसे काम करता है युआन?

सबसे पहले तो यह जान लें कि युआन दुनिया की अन्य करेंसी की तरह काम नहीं करता.

चीन का केंद्रीय बैंक ‘पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना’ रोजाना राष्ट्रीय मुद्रा युआन की कीमत तय करता है.

बैंक एक आधिकारिक मध्यबिंदु (मिडपॉइंट) के ज़रिए इस दर पर नियंत्रण रखता है जिसकी वजह से किसी भी निश्चित दिन कारोबार में उठापटक हो सकती है.

ऐसा करने का मक़सद विनिमय दर को और अधिक ‘बाज़ार के मुताबिक’ बनाना है.

युआन के कमजोर होने का मतलब है कि इससे चीन का निर्यात सस्ता होगा.

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चीन-अमरीका के बीच चल रहा टैरिफ वॉर

चीन अमरीका का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है. अमरीका के कुल व्यापार में चीन की हिस्सेदारी लगभग 16.4 फ़ीसदी है.

लेकिन पिछले कुछ समय से ये दोनों देश एक दूसरे के साथ व्यापार में अड़चनें पैदा कर रहे हैं. यह अड़चन टैरिफ या टैक्स बढ़ाने को लेकर है.

इसमें दोनों देश एक दूसरे के सामान पर टैक्स लगा देते हैं या पहले से चले आ रहे टैक्स को बढ़ा देते हैं जिससे दूसरे देश की चीज़ों की कीमतें बढ़ जाती है.

जब ये कीमतें बढ़ जाती हैं तो वो घरेलू बाज़ार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पातीं. इससे उनकी बिक्री घट जाती है. अमरीका और चीन के बीच पिछले कुछ महीनों से यही चल रहा है.

जुलाई में, अमरीका ने 34 अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाया था. इसके बाद पिछले महीने एक कदम और आगे बढ़ते हुए अमरीका ने 16 अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया था.

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Image captionचीन का केंद्रीय बैंक ‘पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना’

युआन की कीमत कम करने की वजहें

कंसल्टेंसी कैपिटल इकोनॉमिक्स के जूलियन इवांस-प्रिचर्ड समेत कई विश्लेषकों के मुताबिक, चीनी मुद्रा “आने वाले महीनों में दबाव में रहेगी” और इसके 7 युआन प्रति डॉलर के मूल्य तक पहुंचने की संभावना है.

उन्होंने इसके पीछे कुछ वजहें बताईं.

युआन डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ है इसके पीछे अमरीकी फेडरल रिजर्व का ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करना एक बड़ी वजह है.

लेकिन साथ ही चीन की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार भी धीमी पड़ रही है. वर्तमान वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में यह 6.5% के स्तर पर है. साल 2009 के बाद अर्थव्यवस्था में यह वृद्धि अपने न्यूनतम स्तर पर है.

कैपिटल इकोनॉमी के मुताबिक दोनों देशों (अमरीका और चीन) की आर्थिक स्थिति में अंतर उनकी मौद्रिक नीति में फर्क को दर्शाता है, और इसकी वजह से ही अक्सर चीन अपने नियंत्रण वाले विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) में बदलाव करता है.

एक विडंबना यह भी है कि कमज़ोर युआन चीन के निर्यात को बाकी दुनिया के लिए अधिक आकर्षक बनाकर देश की विकास में मदद कर सकता है.

चीन अब एक भंवर में फंस गया लगता है क्योंकि यदि वो युआन को कमज़ोर होते रहने देगा तो इससे राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नराज़गी बढ़ेगी और साथ ही ट्रेड वॉर को और ख़राब भी करेगी.

अमरीका और चीन आमने-सामने

शी जिनपिंग और डोनल्ड ट्रंप नवंबर में दुनिया की बड़ी आर्थिक ताक़तों के बीच होने वाले जी-20 सम्मेलन में मिलने वाले हैं ताकि ट्रेड वॉर को सुलझाया जा सके, लेकिन युआन की दर में और गिरावट इस बातचीत को शुरू होने से पहले ही नाकाम कर सकती है. अगर ऐसा हुआ तो चीन के लिए स्थिति और भी विकट हो जाएगी.

फिर भी विश्लेषकों का कहना है कि चीन के पास फिलहाल युआन को कमज़ोर करने के अलावा कोई और उपाय नहीं है, ख़ासकर तब जब ट्रंप चीन के सभी सामान पर टैक्स लगाने के अपने वादे पर खरे उतरते हैं.

और यदि ऐसा होता है तो चीन के विकास की रफ्तार और भी धीमी पड़ जाएगी और ये वहां की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता के लिए डरावना संकेत है. चीन की शी जिनपिंग सरकार ऐसी स्थिति से किसी भी कीमत पर बचना चाहेगी.

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कितनी मज़बूत है चीनी अर्थव्यवस्था?

अब तक चीन अमरीकी दबाव के आगे झुकने से इंकार करता रहा है, इसके पीछे मज़बूत आर्थिक ढांचा और विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार दो वजहें रही हैं.

विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में चीन आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है. चीन के पास दुनिया में सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा भंडार (3.12 खरब डॉलर) है.

जबकि यह जीडीपी (11 खरब डॉलर) के आकार के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है.

इतना ही नहीं प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के मामले में भी यह तीसरे पायदान पर है.

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चीन की आर्थिक सफलता का मॉडल

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चीन की अर्थव्यवस्था में जो क्रमिक सुधार आया वो बाज़ार के भरोसे नहीं हुआ.

चीन ने इस बात को पहले तय किया कि विदेशी निवेश कहां लगाना है और कहां नहीं.

इसके लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए गए. आर्थिक क्षेत्र के लिए दक्षिणी तटीय प्रांत चुने गए.

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साल 1978 से 2016 के बीच चीन की जीडीपी ज़ोरदार तरीके से बढ़ी.

इसी दौरान 70 करोड़ लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर लाया गया और 38.5 करोड़ लोग मध्य वर्ग में शामिल हुए.

चीन का विदेशी व्यापार 17,500 फ़ीसदी बढ़ा और साल 2015 तक चीन विदेशी व्यापार में दुनिया का लीडर बनकर सामने आया.

साल 1978 में चीन ने पूरे साल जितना व्यापार किया था, अब वो उतना महज दो दिनों में करता है.

लेकिन तमाम तरह के आंकड़े होने के बावजूद अमरीका के साथ चल रहे ट्रेड वार की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है क्योंकि यूरोपियन यूनियन के बाद चीन अमरीका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है और अब यदि युआन सात रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे चला जाता है तो आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक इससे बाज़ार की धारणा पर नकारात्मक असर पड़ेगा जिसका दूरगामी असर चीन पर पड़ेगा.

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