Published On: Mon, Oct 16th, 2017

कठघरे में खाद्य सुरक्षा

इससे ज्यादा चिंताजनक बात किसी भी देश के लिए और क्या हो सकती है कि वैश्विक भुखमरी सूचकांक में उसका नंबर कुल जमा 119 देशों में सौवां हो। माथा शर्म से तब और झुक जाता है जब यह पता चलत है कि इस सूचकांक में उत्तर कोरिया, बांग्लादेश और इराक जैसे देश भारत से ऊपर हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दम भरने के बावजूद ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का 97वें से 100वें स्थान पर आ जाना इस बात को दर्शाता है कि भारत भरपेट भोजन न मिलने, वजन के हिसाब से ऊंचाई कम होने, वजन कम होने और शिशु मृत्यु दर अधिक होने के मामले में बहुत गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। भारत का हंगर इंडेक्स 31.3 है जो गंभीर स्थिति को पार कर चिंताजनक स्थिति के करीब है। जबकि चीन का हंगर इंडेक्स 7 है जो भुखमरी के मामले में सामान्य स्थिति को दर्शाता है।

यह रिपोर्ट इस बात की ओर भी संकेत करती है कि करीब डेढ़ दशक से भारत की जीडीपी दर ऊंची रहने के बावजूद भुखमरी लगातार बढ़ी है, बढ़ रही है। यानी आर्थिक विकास का लाभ गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहा है। सबका साथ सबका विकास के ध्येय-वाक्य के साथ आगे बढ़ रही सरकार के रहते भुखमरी और कुपोषण के मामले में भारत की गंभीर स्थिति इस कड़वी हकीकत की ओर इशारा करती है कि देश में जो विकास हो रहा है वह आबादी के एक छोटे-से हिस्से तक सीमित है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट) के मुताबिक देश के कुल जमा धन का आधे से ज्यादा हिस्सा एक प्रतिशत आबादी के पास है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि देश में होने वाली आर्थिक तरक्की का लाभ मुट्ठी भर लोग ही उठा पा रहे हैं। गरीब का अधिक गरीब और अमीर का अधिक अमीर होना साफ दिखाई दे रहा है।

यह एक महान अर्थशास्त्री के उस विनोदपूर्ण तंज को चरितार्थ कर रहा है जिसमें कहा गया है कि- एक कहता है मैं क्या खाऊं, और दूसरा भी यही कहता है मैं क्या खाऊं? लेकिन दोनों के कहने में जमीन-आसमान का अंतर है। अमीर आदमी के पास इतनी अधिक संपन्नता और खाने के इतने सारे विकल्प मौजूद हैं कि उसके लिए चुनाव कर पाना मुश्किल हो रहा है कि मैं इनमें से क्या खाऊं? वहीं सामने एक गरीब है, उसकी जेब में इतने पैसे भी नहीं हैं कि वह भरपेट भोजन कर सके। तब उसे मजबूर होकर अपने आप से सवाल करना पड़ता है कि मैं क्या खाऊं? ये दो स्थितियां एक भारत के भीतर की दो स्थितियों का बयान कर रही हैं।

सबको पोषण उपलब्ध कराने की घोषित प्रतिबद्धता के बावजूद भ्रष्टाचार, लालफीताशाही तथा अन्य वजहों से सब तक खाद्यान्न नहीं पहुंच पा रहा है। और गरीबी के शिकार लोग भुखमरी के भी शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भुखमरी कुपोषण का चरम रूप है। शिशु मृत्यु दर असामान्य होने का प्रमुख कारण भी कुपोषण ही है। भारत को भुखमरी और कुपोषण से निजात दिलाने के लिए यह आवश्यक है कि गरीब-अमीर के बीच की खाई को पाटा जाए और सबको जीने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। भारत में आजादी के सत्तर साल बाद भी देश का हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। अपने देश के नवजात शिशुओं को इतना संतुलित आहार उपलब्ध नहीं करा पाना जिससे कि उनके शरीर का यथेष्ट विकास संभव हो सके, इससे बड़ी किसी राज्य-तंत्र की विफलता और क्या हो सकती है! आज भी देश के 19 करोड़ लोग यानी 14.5 प्रतिशत आबादी कुपोषण की चपेट में है। कुपोषण की भयावहता सही मायने हमें भविष्य में तब पता चलेगी जब देश में हर तीन में से एक बच्चा कुपोषित होगा और हर दो महिलाओं में से एक खून की कमी की शिकार होगी। भारत में प्रतिदिन तीन हजार बच्चे कुपोषण के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। एक तरफ भारत जहां दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, वहीं दूसरी तरफ यह सबसे ज्यादा कुपोषण-ग्रस्त देशों में भी अग्रणी है।

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि देश में लाखों टन अनाज प्रतिवर्ष भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के गोदामों में बारिश की भेंट चढ़ जाता है, और दूसरी तरफ आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी की चौखट पर दम तोड़ रहा है। भारत को प्रतिवर्ष गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रु. का नुकसान होता है । वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 68.5 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है। भारत में प्रतिवर्ष पांच साल से कम आयु के दस लाख बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। गर्भ धारण करने वाली हर दो माताओं में से एक कुपोषण के कारण रक्ताल्पता अर्थात एनीमिया से ग्रस्त होती है।
इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 23 करोड़ टन दालें, 12 करोड़ टन फल व 21 टन सब्जियां आपूर्ति या वितरण प्रणाली की खामियों के चलते खराब हो जाती हैं। उत्सव, समारोह, शादी-विवाह आदि में बड़ी मात्रा में पका हुआ भोजन बर्बाद कर दिया जाता है। कुपोषण और भुखमरी से निपटने का एक आवश्यक कदम यही होगा कि इस तरह की खाद्य बर्बादी पर रोक लगे। इसके लिए समाज में भी अभियान चले और सरकार भी प्रयास करे। कुपोषण पर विजय प्राप्त कर किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद को दो से तीन प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।
भारत कुपोषण की वजह से भारी कीमत चुका रहा है। यह कीमत आमदनी में नौ-दस प्रतिशत की कमी के रूप में सामने आ रही है। कुपोषण के कारण महिलाओं और बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। नतीजतन महिलाओं को खून की कमी, घेंघा रोग तथा बच्चों को सूखा रोग या रतौंधी और काफी हद तक उनके अंधत्व का शिकार हो जाने का खतरा बना रहता है।

ग्रामीण इलाकों में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या अधिक है। आरएसओ के आंकड़ों के मुताबिक 29.5 फीसद पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों का वजन औसत से कम है। कुपोषण के चलते बच्चों का शारीरिक विकास तो प्रभावित होता ही है, यह उनके मन-मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव डालता है। भारत में पांच साल से कम उम्र के लड़के, जिनका विकास विश्व स्वास्थ्य मानकों के हिसाब से कम हुआ है, उनकी संख्या 35.5 प्रतिशत है, जबकि ऐसी लड़कियों की संख्या 37.5 प्रतिशत है। यह हालत तब है जब एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के नाम से दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषण निवारण योजना भारत में लंबे समय से चलाई जा रही है। आखिर इस योजना का हासिल क्या है? भारत में कुपोषण की व्यापकता के मद््देनजर पीडीएस यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर भी सवाल उठते हैं। पिछले दिनों में राजस्थान में पीडीएस का अनाज चोरी-छिपे खुले बाजार में पहुंच जाने की खबर आई। यह घपला बरसों से चल रहा था। यह भी गौरतलब है कि इस तरह के घपले अन्य राज्यों में उजागर हो चुके हैं। जाहिर है, भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद लज्जाजनक सोपान पर खड़ा है, तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन की खामियां और गरीबों के प्रति राज्य-तंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख हैं।

 

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